गुरुवार, 15 दिसंबर 2022

शंकर दास की कविता - फुलों कि चाहत

जाता था फुलो कि चाहत में मैं रोज जहां
डगर - डगर पर कांटे हैं रखु मै अब पैर कहा
जाता था फुलो कि चाहत में मैं रोज जहां।

तैयार नहीं है कोई यहां कर्म के फल भोगने को दोष देता भगवान को
समझ कर भी ना समझ सका इंसान ने इंसान को
सच से सामना जब किया टूट गया आसमान वहां
जाता था फूलों की चाहत में मैं रोज जहां।

मान सम्मान को क्या कहेना सबको अपने आप में आन हैं
रहा नहीं अब स्वार्थ का सीमा खुदगर्ज सब इंसान हैं
कांटो जैसी चुभने लगा हूं सब उम्मीद ना उम्मीद रहा
जाता था फूलों की चाहत में मैं रोज जहां।

लोग अपना बना कर कर लेते हैं छल
अपने ही छलते हैं पल-पल
अपना अपना सब कहेता है अपना है अब कहां
जाता था फूलों की चाहत में मैं रोज जहां।

लेखक - शंकर दास









शुक्रवार, 23 सितंबर 2022

गरीबी और शोषण से बचने का एकमात्र उपाय है शिक्षा।



आप ऐसे प्रयत्न करे जीससे आपके बच्चें अच्छी जीवन बिता सकें केवल जीवित रहना कोई विशेषता नहीं है। मूल बात जीवित रहने के स्तर की है। कोई व्यक्ति बहादुर बनकर जीता है कोई कायर बनकर। केवल जिवित रहेंगे और सम्मान के साथ जिवित रहने में बहुत अंतर है ।

ज्ञान हि आदमी के‌ जीवन की 
आधारशिला है यदि आप संघर्ष 
पर उतारू हो जाओ तो सफलता
आपके कदम चूमेगी । ध्येय सच्चे 
हो तो दूश्मन को रास्ता छोड़ना
ही परेगा परतंत्रता से मनुष्य का 
जीवन जानवरों से ‌भी‌‌ बदत्तर 
हो जाता है। 

अपमान के सौ वर्षों
कि जिंदगी ‌से स्वाभीमान की 
थोड़ी जिंदगी ज्यादा बेहतर है।
 
प्रयत्न करें कि ‌हम मुर्ख भी ‌रहेगें 
तो‌ सम्मान से ‌रहेगें, स्वाभीमान
और आत्मा सम्मान से ‌रहेगें । 

सम्मान से बढ़कर मनूषय ‌के लिए 
कूछ भी मुल्यवान नहीं है  
हमारा संघर्ष मात्र सामाजिक, राजनैतिक व 
आर्थिक आज़ादी के लिए हीं नहीं
बल्कि आत्म सम्मान के लिए भी होनी चाहिए।
लेखक - शंकर दास


शनिवार, 17 सितंबर 2022

शंकर दास की कविता - पहाड़ों से टकराना सीखो।


चलना सिखों ,उड़ना सीखो

पहाड़ों से टकराना सीखो

विषम परिस्थिति में जिन्दगी जीना ही जिंदगी है

कयामत से भी लड़ना सीखो

चलना सीखो उड़ना सीखो

पहाड़ों से टकराना सीखो।


जिन्दगी भी अपने आप में गजब की एक कहानी है

बिन मेहनत जो मिल जाए फल नहीं वो पानी है

कामयाबी की तकदीर को कलम से अपना खुद ही लिखो

चलना सीखो उड़ना सीखो

पहाड़ों से टकराना सीखो।


भेद न लेना लक्ष्य को जब तक शिखर के अंतिम चरण को जानना

सारी दुनिया कुछ भी कह दे अपने आप में हार ना मानना

सोच को सच में तब्दील करना दशरथ मांझी से सीखो

चलना सीखो उड़ना सीखो

पहाड़ों से टकराना सीखो। 

लेखक - शंकर दास 


बुधवार, 24 नवंबर 2021

(जल) मेरी पुकार सुनो , हिन्दी कविता

(जल) मेरी पुकार सुनो
मुझे व्यर्थ ना करो   
हम से ही जीवन संसार है
कहीं-कहीं मेरे लिए ही मचता हाहाकार है
मुझे व्यर्थ ना करो, हमसे ही जीवन संसार है।

मेरे मुल्य उनसे पूछो सुबह-शाम जो लाइन में रहते
तरप-तरप के आह जो भरते,
समय की परिभाषा देखो लोग हमको भी अब करते व्यापार है
मुझे व्यर्थ ना करो हमसे ही जीवन संसार हैं।

हम ना होंगे जीव ना होगा जानते हैं ये दुनिया सारी
अफसोस मुझे मूल्य मेरा जान कर भी लोग करते हैं क्यों मुझे बर्बादी,
मैं खोया तो दुनिया खोया फिर भी मुझे ना अहंकार है
मुझे व्यर्थ ना करो हमसे ही जीवन संसार है।

एक होते हुए भी मैं हजार छाप से जाना जाऊंगा
सोचा ना था कभी बंद बोतल में बिक पाऊंगा,
मेरे मूल्य को जान गए हो मुझे बचा लो विनती जग से यही बार-बार है
मुझे व्यर्थ ना करो हमसे ही जीवन संसार है।

 लेखक
शंकर दास
https://kolkatahindinews.com/poem-of-shankar-das-jal-hear-my-call/
 

मंगलवार, 3 अगस्त 2021

जितना ज्यादा टेक्नोलॉजी बठेगी उतना ज्यादा बेरोजगारी

जितना ज्यादा टेक्नॉलॉजी बढ़ेगी उतना ज्यादा ही बेरोजगारी बढ़ेगी।
 अगर सबसे गंभीर समस्या कोई है तो वह बेरोजगारी है, हमारे हिसाब से बेरोजगारी का मुख्य कारण टेक्नॉलॉजी है।
इस वर्तमान समय में सरकार को बेरोजगारी को दूर करने के उपाय को ढूंढना अति आवश्यक है, क्या आपको यह नहीं लगता कि हमसे हमारा रोजगार टेक्नोलॉजी छीन रहा है।
सरकार दूसरे देश के सामने बेहतर प्रदर्शित होने के लिए जो टेक्नोलॉजी बढ़ा रही है या दूसरे देश से ला रही है इस सब का असर आम-जनता पर पड़ता है, जैसे-जो मजदूर है,किसान हैं।
पहले अगर सड़क निर्माण होता था तो उसमें आवश्यकता अनुसार मजदूर को काम दिया जाता था और वह कुदाल से मिट्टी काटकर अपने सर पर मिट्टी लेकर सड़क को बनाने का काम करता था 
पर अब ऐसा नहीं है, अब उस मजदूर का काम ट्रैक्टर और जेसीबी जैसे कई अत्याधुनिक मशीन करता है
तो क्या जो मजदूर पहले मजदूरी करता था वह बेरोजगार नहीं होगा,
पहले किसान खेत को हल से जोतता था हाथ से बीज बोता था उसके बाद फसल काटने के समय मजदूर से फसल कटवाकर उसे मजदूरी दिया जाता था पर अब ऐसा नहीं है
ट्रैक्टर से जुताई होता है मशीन से बीज बोया जाता है मशीन से ही फसल काटा जाता है
इसमें मजदूर का काम रह ही नहीं जाता है 
तो क्या यह सब अब सोचनीय बात नहीं है कि जो काम पहले मजदूर करता था अब उसी काम को टेक्नोलॉजी द्वारा करा लिया जाता है
तो अब यह स्पष्ट है कि मजदूर बेरोजगार है और इस बेरोजगारी का मुख्य जड़ टेक्नोलॉजी है।
और इसे बढ़ावा देने वाली सरकार है
इसीलिए सरकार को आम जनता के बेरोजगारी के बारे में गंभीर चिंतन करना चाहिए और समस्या का निदान ढूंढना चाहिए।
हम बिहार के जिस प्रांत से आते हैं उस प्रांत के तकरीबन 40 से 45% परसेंट एवं पूरे बिहार और यूपी के अधिकतर लोगों की जीवन-यापन पंजाब, हरियाणा,राजस्थान एवं विभिन्न राज्यों के फसल की कटाई एवं बुआई और धान की रोपनी पर उस परिवार का जीवन-यापन चलता है।
मजदूर धान रोपता है अब धान रोपने वाली मशीन आ गई है।
मजदूर फसल काटता है और फसल काटने वाली मशीन आ गई है
तो पहले यह मजदूर जो काम करते थे अब यह काम मशीन कर रही है
जब मेरा उम्र करीब 9 से 10 साल था तब हम सुनते थे कि लोग किसी कारण बस अगर किसी से ब्याज पर रुपया लेता था 
और जब रुपया वापस मांगा जाता था तो लोग कहते थे कि हम कटनी (फसल की कटाई) करने बाहर (दूसरे प्रदेश) जा रहे हैं तो वहां काम करके आप का रुपया शुद्-ब्याज सहित लौटा देंगे।
 पर अब सुनने को मिलता है कि उसी प्रदेश में अब मजदूरों को काम नहीं मिलता है सारे के सारे काम टेक्नॉलॉजी कर रही है और मजदूर अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए दर-दर ठोकरें खाने पर मजबूर है,
और रोजगार कि कहीं कोई दूर तक राह नहीं दिख रहा है।
हाल फिलहाल में हमारे कई दोस्तों से मुलाकात हुई है वे लोग कपड़े पर कढ़ाई के काम करते थे पर अब कहते हैं कि हमसे हमारा रोजगार छिन गया अब हम मजदूर लोगों का कोई काम ही नहीं रह गया है अब कपड़े पर भी कढ़ाई के काम भी मशीन ही करती है (यानी टेक्नॉलॉजी)
अब मान लिया जाए अगर किसी काम को करने के लिए 10 व्यक्ति की जरूरत पड़ती है तो मशीन से काम करने के लिए किसी एक व्यक्ति की जरूरत पड़ती है
तो बाकी 9 आदमी बेरोजगार हुए ना,
इसीलिए मेरे हिसाब से टेक्नोलॉजी आम मजदूर जनता के लिए खतरनाक साबित हो रही है।
इस मजदूर बेरोजगार के बारे में सोचते हुए सरकार को इस विषय पर गहरी विचार करना चाहिए।
इसी प्रकार विभिन्न कामों में टेक्नोलॉजी बढ़ रही है और उस काम को करने वाले मजदूर बेरोजगार हो रहे हैं।

लेखक- शंकर दास
सामाजिक कार्यकर्ता एवं (युवा शक्ति समाज कल्याण सदस्य)

शंकर दास की कविता - फुलों कि चाहत

जाता था फुलो कि चाहत में मैं रोज जहां डगर - डगर पर कांटे हैं रखु मै अब पैर कहा जाता था फुलो कि चाहत में मैं रोज जहां। तैयार नहीं है कोई यहां...