डगर - डगर पर कांटे हैं रखु मै अब पैर कहा
जाता था फुलो कि चाहत में मैं रोज जहां।
तैयार नहीं है कोई यहां कर्म के फल भोगने को दोष देता भगवान को
समझ कर भी ना समझ सका इंसान ने इंसान को
सच से सामना जब किया टूट गया आसमान वहां
जाता था फूलों की चाहत में मैं रोज जहां।
मान सम्मान को क्या कहेना सबको अपने आप में आन हैं
रहा नहीं अब स्वार्थ का सीमा खुदगर्ज सब इंसान हैं
कांटो जैसी चुभने लगा हूं सब उम्मीद ना उम्मीद रहा
जाता था फूलों की चाहत में मैं रोज जहां।
लोग अपना बना कर कर लेते हैं छल
अपने ही छलते हैं पल-पल
अपना अपना सब कहेता है अपना है अब कहां
जाता था फूलों की चाहत में मैं रोज जहां।
लेखक - शंकर दास